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कवि कुशललाभ के ग्रंथ ‘पिंगल शिरोमणि’ तथा ‘अबुल फजल’ के ‘आइने अकबरी’ में प्रयोग हुआ है
उत्तर
राजस्थानी भाषा मारवाड़ी शब्द का
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प्राचीन साहित्यकार जिसने प्रमुख आर्य भाषाओं में मारवाड़ी भाषा को भी शामिल किया है
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मारवाड़ी की उपबोली है
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राजस्थानी भाषा में स्वर हैं
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हाड़ौती का भाषा के अर्थ में प्रयोग सर्वप्रथम किया गया
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‘निमाड़ी एवं रागड़ी’ विशेषता है
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अलवर-भरतपुर क्षेत्र की बोली है
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कवि सूर्य मल्ल मिश्रण की अधिकांश रचनाएँ हैं
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क्षेत्रफल की दृष्टि से प्रथम स्थान है
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गौड़वानी बोली का क्षेत्र है
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जोघराज का हम्मीर रासौ महाकाव्य, शंकर राव का भीम विलास काव्य, अलीबख्शी ख्याल आदि की रचना की गई है
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झालावाड़, कोटा व प्रतापगढ़ में बोली जाती है
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डूँगरपुर में बोली जाने वाली बोली कहलाती है
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डूँगरपुर, बाँसवाड़ा में बोली जाने वाली बोली कहलाती है
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डूंगरपुर-बांसवाड़ा क्षेत्र में बोली जाती है
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दक्षिणी राजस्थानी भाषा को कहा जाता है
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देवनागरी लिपि पूर्ण रूप से परिपक्व हुई
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पश्चिमी राजस्थान की प्रधान बोली है
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पश्चिमी राजस्थानी की प्रतिनिधि बोली है
उत्तर
मारवाड़ी, मेवाड़ी और बागड़ी
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पिंगल शैली प्रचलित रही है
उत्तर
पूर्वी राजस्थान में
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पूर्वी राजस्थान के मध्य पूर्व भाग की प्रधान बोली है
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पूर्वी राजस्थान के मध्य पूर्वी भाग की प्रधान बोली है
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प्रतापगढ़, अजबगढ़, थानागाजी और बलदेवगढ़ में बोली जाने वाली बोली है
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भारतीय आर्य वंश से जुड़ी हुई भाषा है
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भीलों की बोली कहा जाता है