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अलाउद्दीन खिलजी के रणथम्भौर आक्रमण के समय रणमल एवं रतिपाल सेनानायक के विश्वासघात के कारण पराजय का सामना करना पड़ा
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प्रथम खिलजी सुल्तान जिसने रणथम्भौर दुर्ग पर आक्रमण किया
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राजपूतों की अग्निकुण्ड से उत्पत्ति के मत का प्रतिपादन सर्वप्रथम किया था
4
‘उसने मलेच्छों का दमन कर आर्यावर्त को वास्तव में आर्यभूमि बना दिया था’ इतिहासकार डॉ. गोपीनाथ शर्मा ने उक्त कथन प्रयुक्त किया है
उत्तर
चौहान शासक विग्रहराज चतुर्थ के लिए
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1308 सिवाना का दुर्गाधिपति था
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अखैराज देवड़ा प्रथम जिसे ‘‘उडणा अखैराज’’ के नाम से जाना जाता है का सम्बन्ध था
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अधीनता स्वीकार कर ली थी
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अलाउद्दीन की पुत्री फिरोजा से प्रेम हो गया था
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अलाउद्दीन के सेनापति जिसने जालौर दुर्ग पर घेरा डाला
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अलाउद्दीन खिलजी ने सिवाना दुर्ग पर विजय के पश्चात् दुर्ग सौंपा था
उत्तर
कमालुद्दीन गुर्ग को
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अलाउद्दीन ने जालौर का नाम बदलकर रखा
12
अलाउद्दीन ने सिवाना व जालौर का प्रशासक बनाया
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आबू का परमार राजा जो ‘परमारों का मरुमण्डल महाराज’ कहलाता था
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आबू के परमार वंश का सबसे प्रतापी शासक था
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आबू के परमार शासक जिसको महामण्डलेश्वर भी कहा गया है
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आबू के परमारों का मूल पुरुष माना गया है
17
आबू के परमारों की प्राचीन राजधानी थी
उत्तर
सिरोही (चन्द्रावती)
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कन्नौज के गहड़वाल वंशीय शासक जयचन्द के निमंत्रण पर मुहम्मद गौरी ने आक्रमण किया था
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कान्हड़देव का वह सैनिक जिसके विश्वासघात के कारण वह अलाउद्दीन से पराजित हो गया था
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कोटा का नाम बदलकर ‘नन्दग्राम’ कर दिया था
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कोटा का शासक जिसने ई. में अंग्रेजों से संधि कर ली
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कोटा के शासक जिसने कृष्णभक्ति के प्रभाव में अपना नाम बदलकर ‘कृष्णदास’ कर दिया था
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कोटा के शासक शत्रुशाल के समय से उद्भव माना जाता है
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कोटा के शासक शत्रुशाल हाड़ा (1758-1764 ई.) के समय की सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटना थी
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कोटा को बूँदी से पृथक करने का श्रेय दिया जाता है
उत्तर
मुगल शासक शाहजहाँ को