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आहड़ सभ्यता को ताम्रयुगीन सभ्यता की संज्ञा दी
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1977-78 ई. में ताम्रकालीन सभ्यता के मिट्टी के बर्तन मिले हैं
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अनाज रखने के बड़े मृदभाण्ड जिन्हें ‘गोरे बंकोठ’ कहा जाता था, प्राप्त हुए हैं
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आदमकद यक्ष की प्रतिमा प्राप्त हुई है
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आहड़ (उदयपुर) के पास स्थित है
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आहड़ सभ्यता के लोग अच्छी प्रकार परिचित थे
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आहड़ सभ्यता के लोगों की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार था
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आहड़ सभ्यता में मकान बने होते थे
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कालीबंगा के अतिरिक्त खोपड़ी की शल्य चिकित्सा के अवशेष प्राप्त हुए हैं
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कालीबंगा सभ्यता के काल में लोग प्रयोग करते थे
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काले रंग के चित्रित पात्रों पर नृत्य मुद्राएँ व चिकतेदार हिरण का मिलना विशेषता है
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खड़िया मिट्टी से बनी कामदेव-रति की कुषाणकालीन मृणमूर्ति प्राप्त हुई है
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गणेश्वर सभ्यता का सम्बन्ध है
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गरदड़ा, जहाँ से वर्ष में देश की पहली बर्ड राइडर रॉक
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गिलूण्ड की खुदाई का कार्य किया
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गुप्त तथा प्रतिहार सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं
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गुप्तकालीन कृष्ण लीला का चित्रांकन प्राप्त हुआ है
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जीवन्त स्वामी की धातुमूर्ति (प्रतिकार कला) जून में मिली
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जीवाश्म का अध्ययन कहलाता है
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जोधपुरा सभ्यता स्थित है
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जौ और गेहूँ फसलों के साक्ष्य प्रमुख रूप से मिले हैं
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डायनासोरों की रोमांचक दुनिया की तह में जाने में जुटे जयपुर के एक वरिष्ठ जीवाश्म विज्ञानी जिनको वर्ष में जैसलमेर
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तांबे से निर्मित बैल, खरगोश तथा पक्षियों की आकृति प्राप्त हुई है
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ताम्रयुगीन सभ्यता की चूड़ियाँ प्राप्त हुई हैं
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तिलवाड़ा (बाड़मेर) की खोज की थी