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दूल्हे-दुल्हन के कान पर व सिर पर बाँधने का सेहरा कहलाता है
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पाणिग्रहण से पूर्व वर की ओर से वधू को पहनाई जाने वाली चाँदी की मुद्रिका कहलाती है
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पुरुष व स्त्रियों द्वारा गले में पहना जाने वाला मुख्य आभूषण है
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फसल रक्षार्थ पशु-पक्षियों को डराने हेतु खेत में खड़ा किया जाने वाला मानव आकृति का पुतला कहलाता है
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बागी, डाकू, उपद्रवी से आशय है
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बाजार या मंडी में अनाज आदि का बोझा ढोने वाला मजदूर कहलाता है
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बारात प्रस्थान से पूर्व की जाने वाली गणेश पूजा को कहते हैं
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ब्याज पर रुपया उधार देने का धंधा कहलाता है
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भूमि के स्वामित्व का अधिकार पत्र कहलाता है
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मवेशियों के आगे चरने का चारा डालना कहलाता है
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मांगलिक अवसर पर प्रयुक्त चावल या गेहूँ के दाने को कहते हैं
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माल ढोने या कृषि कार्य के बैलों का समूह है
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मोर, पगपान व फोलरी पर्याय हैं
289
रांधणा-सीधणां है
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राजस्थान के संदर्भ में ‘पीला पोमचा’ है
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राजस्थान में प्रचलित सुरलिया आभूषण पहना जाता है
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राजस्थान में मल्लाह को कहते हैं
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लकड़ी या लोहे में छेद करने का औजार है
294
लुहार की भट्टी को कहते हैं
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वंशावली पढ़ने-लिखने का काम करने वाली एक प्रकार की जाति है
296
वह स्थान जहाँ नि:शुल्क भोजन व आवास की व्यवस्था हो
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विवाह के समय वधू के लिए बनाई गई विशिष्ट पोशाक है
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विवाह मंडप में अग्नि परिक्रमा के पश्चात् कन्या को पहनाई जाने वाली पोशाक को कहते हैं
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विवाहित पति को छोड़कर दूसरे की पत्नी बनने वाली स्त्री कहलाती है
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शराब का व्यवसाय करने वाला कहलाता है