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राजस्थान की कला एवं संस्कृति

राजस्थान के प्रमुख रीति-रिवाज, प्रथाएँ, परम्पराएँ, वेशभूषा, आभूषण एवं शब्दावली

788 प्रश्न उपलब्ध हैं। उत्तर पढ़ने के लिए बटन दबाएँ।

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401

गिरवी रहने की क्रिया को कहते हैं

402

घाघरे के स्थान पर पहना जाने वाला छपा हुआ वस्त्र है

403

जैन समुदाय में शरीर त्याग हेतु स्वेच्छा से किया जाने वाला अन्न-जल का त्याग कहलाता है

404

दरियाई नारियल का संपुटनुमा भिक्षापात्र है

405

दीवार की सतह नापने का लकड़ी का एक उपकरण है

406

दुल्हन द्वारा पहने जाने वाली लाख की चूड़ी को कहते हैं

407

दुष्काल पड़ने पर अन्य प्रदेश में मवेशियों के साथ गमन या ऐसा स्थान जहाँ मवेशी सहित ठहरा जाता हो, कहलाता है

408

पशुओं के क्रय-विक्रय के लिए लगाई गई अस्थायी हाट है

409

पुत्र जन्मोत्सव पर गाया जाने वाला लोकगीत कहलाता है

410

पुरुषों के गले में धारण करने का सोने व चाँदी से निर्मित आभूषण कहलाता है

411

पुरुषों द्वारा का में पहने जाने वाले जेवर का स्थानीय नाम है

412

पौधे का कटने के बाद पीछे रहने वाला भाग है

413

फेरी लगाकर सौदा बेचने वाले व्यापारी को कहते हैं

414

बलिदान या सती होने के लिए जुझार या सती के द्वारा दीवार पर कुमकुम से हाथ का लगाया हुआ छापा कहलाता है

415

मटकी आदि में पानी लेने का डंडी वाला पात्र है

416

मरे हुए गाय, बैल का साफ किया हुआ आधा चमड़ा कहलाता है

417

महिलायें ‘नथ’ धारण करती हैं

418

मेवात क्षेत्र में प्रचलित कंठ के आभूषण को कहते हैं

419

यज्ञ कुण्ड में आहुति देने का लकड़ी का कलछा है

420

लाव-चड़स खींचने हेतु बैलों के चलने का ढलाननुमा स्थान है

421

लोकप्रिय आभूषण ‘तगड़ी’ पहना जाता है

422

वर पक्ष द्वारा किया जाने वाला प्रीतिभोज कहलाता है

423

वर्षा के अभाव में कुएँ के पानी से की जाने वाली साधारणा सिंचाई को कहते हैं

424

वस्त्र के टुकड़ों का बना चोगा और जैन साध्वियों के वस्त्र से आशय है

425

वह ऊँट जिस पर पलाण कसा हुआ न हो