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राजपूत वंश जिसका वर्चस्व आठवीं से दसवीं शताब्दी तक राजस्थान में रहा
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राजस्थान का प्राचीनतम ज्ञात राजवंश माना जाता है
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राजस्थान में प्रतिहार वंश का शासन रहा है
उत्तर
मण्डौर, भीनमाल, जालौर
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राजस्थान में प्रतिहार वंश के संस्थापक हरिश्चन्द्र की राजधानी थी
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राष्ट्रकूट शासक जिसने प्रतिहार शासक वत्सराज को पराजित किया
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वह अरब यात्री जिसके विवरण से प्रतिहार शासक मिहिरभोज के बारे में कई जानकारी प्राप्त होती है
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वह प्रतिहार राजा जिसके काल में प्रसिद्ध ग्वालियर प्रशस्ति की रचना की गई
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वह प्रतिहार शासक जिसने ई. में घटियाला के शिलालेख
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वह प्रतिहार शासक जिसने ‘प्रभास’ व ‘आदिवराह’ की उपाधियाँ धारण की थी
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वह प्रशस्ति जिससे हमें यह ज्ञात होता है कि नागभट्ट द्वितीय ने कन्नौज को अपनी राजधानी बनाया था
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सरस्वती कण्ठाभरण, राजमृगांक, विद्धज्जनमण्डल, समरांगण, शृंगार मंजरी कथा, कूर्मशतक आदि ग्रंथों के रचनाकार हैं
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‘पार्थ पराक्रम व्यायोग’ नामक नाटक की रचना की थी
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‘‘मिहिरभोज हर एक कवि को प्रत्येक श्लोक पर एक लाख मुद्रायें प्रदान करता था।’’ यह कथन है
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739 तथा चित्तौड़ को लूटा उस समय वहाँ राज्य था
उत्तर
प्रतिहार राजा बाणभट्ट का
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851 वर्णन किया है
उत्तर
प्रतिहार शासक मिहिरभोज के शासन का
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आठवीं शताब्दी में अवंति में स्थापना हुई
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कन्नौज पर अधिकार हेतु चले त्रिपक्षीय युद्ध में भाग लिया था
उत्तर
राजपूताना के गुर्जर प्रतिहार शासकों ने
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गुर्जर प्रतिहार शासक जिसने अपनी राजधानी मेड़ता बनाई
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चीनी यात्री ह्वेनसांग ने गुर्जरों की राजधानी बताया है
उत्तर
पी-लो-मो-लो (भीनमाल)
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जालौर के प्रतिहार राजवंश का संस्थापक माना जाता है
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जालौर शाखा का वह प्रतिहार शासक जिसको रणहस्तिन कहा गया है
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त्रस्त जनता का उद्धार करने व समाज की शत्रुओं से रक्षा करने के कारण ग्वालियर प्रशस्ति में नागभट्ट को संबोधित किया गया है
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प्राचीन राजस्थान में मालवोंं की शक्ति का केन्द्र केन्द्रित था
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मसूदी भारत आया
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राजस्थान में प्रारम्भ में परमारों का अधिकार था