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मारवाड़ में पाई जाने वाली गायक जाति कानगूजरी का प्रमुख वाद्य है
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मावलिया व होली नृत्य संबंधित है
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मिरासी जाति के लोग, जिनका मुख्य पेशा सारंगी वादन रहा है, वे रहते हैं
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मुँह से बजाया जाने वाला वाद्य यंत्र है
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मेवाड़ के महाराणा जिन्होंने संगीत पर ग्रंथ लिखे थे
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मोर-मोरनी नृत्य प्रसिद्ध है
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राजस्थान का एकमात्र ऐसा लोकवाद्य जिसकी डोटी में तनाव के लिए पखावज की तरह लकड़ी के गुटके डाले जाते हैं
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राजस्थान का प्रमुख लोकनृत्य है
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राजस्थान का राज्य वाद्य है
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राजस्थान का वह लोक वाद्य जिसको ज्यूज हार्प भी कहा जाता है
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राजस्थान की माँड गायन शैली से जुड़ी हुई हैं
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राजस्थान के उमर फारुख मेवाती का सम्बन्ध था
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राजस्थान में भील जनजाति का अभिलाक्षणिक नृत्य एवं राजपूत महिलाओं का सामुदायिक नृत्य है
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राजस्थान में ‘लोकनृत्यों का सिरमौर’ कहा जाता है
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रावल जाति द्वारा किया जाने वाला नृत्य है
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रोहिड़ा नृत्य का प्रचलन है
उत्तर
चित्तौड़गढ़ क्षेत्र में
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लोक नृत्य की भवाई शैली से संबंधित था
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लड़की की विदाई के अवसर पर किया जाता है
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वागड़ क्षेत्र में प्रचलित घूमर-घूमरा नृत्य ब्राह्मण जाति में किया जाता है
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वाद्य यंत्र ‘टामक’ का संबंध है
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सामरजी तथा दयाराम का सम्बन्ध है
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सामाजिक व धार्मिक लोकनृत्य के अन्तर्गत आता है
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सिरोही का प्रसिद्ध नृत्य है
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स्त्रियों द्वारा किया जाने वाला तेरहताली नृत्य किया जाता है
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‘म्हारौ बरसाले री मूमल, हालैनी ऐ आलीजे रे देख’ नामक लोकगीत है