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राजस्थान का वह लोक नाट्य जो मेरू नाट्य के नाम से जाना जाता है
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राजस्थान का वह शहर जहाँ से प्रसिद्ध नृत्य ढोल का आरंभ हुआ था
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राजस्थान का सबसे प्राचीन लोकनाट्य माना जाता है
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राजस्थान के जैसलमेर जिले से संबंधित है
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राजस्थान के डीग (भरतपुर) में जानकीलाल ने प्रचलन प्रारंभ किया
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राजस्थान के लोकनाट्य जिसमें सुसज्जित मंच बनाए जाते हैं
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राजस्थान में एक विरह गीत है
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राजस्थान में रासलीला का प्रमुख केन्द्र है
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राजस्थान में हाथरसी ख्याल जाने जाते हैं
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राणा कुम्भा को दक्षता हासिल थी
उत्तर
वीणा वाद्ययंत्र में
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लोक संगीत की विधा तालबन्दी गायकी राजस्थान में प्रसिद्ध है
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लोकनाट्य विधा है
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वह नृत्य जिसका प्रारंभ पुरुषों द्वारा हाथ में तलवार लेकर या छाता लेकर करते हैं
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वह लघु नाटिका जिसमें एक व्यक्ति द्वारा अपनी धर्म बहिन की अंगूठी को मछली के पेट से वापस लाने की कहानी का मंचन होता है
उत्तर
अम्बाव तथा कालू कीर
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वाद्य रहित नृत्य है
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शाहजहाँ के समय प्रचलित नाहर नृत्य जो शाहजहाँ के मनोरंजन के लिए कृत्रिम रूप से शेर-शिकार के आयोजन के साथ प्रारम्भ हुआ, वह प्रसिद्ध है
उत्तर
माण्डल (भीलवाड़ा) में
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सबसे अधिक नौटंकियाँ (नौटंकी मंडलियाँ) होती हैं
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सर्वप्रथम राज्य के जयपुर जिले में शुरू हुआ
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हवेली संगीत के गायक हैं
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हुरंगा का आयोजन किया जाता है
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होली व गणगौर पर गाया जाता है
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‘कन्हैया ख्याल’ नामक लोकनाट्य (संगीत दंगल) अनुपम विशेषता है
उत्तर
करौली, श्री महावीरजी और भरतपुर की
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‘गीगला रा बापू’ और ‘लड़े सूरमा आज जी’ से संबंधित हैं
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‘छिद्रित मटका जिसमें दीपक जलता है’ यह विशेषता है
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‘दुकाली’ नामक वाद्य मुख्यत: बजाते हैं