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‘नारों का स्वांग’ प्रसिद्ध है
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‘रम्मत’ के मुख्य वाद्य हैं
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अलवर व टोंक क्षेत्र में बजाया जाने वाला मेवों के भाटों का प्रमुख वाद्य है
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आम की लकड़ी से बना ढप के लघु आकार का ताल वाद्य है
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कर्कश प्रकृति का राग है
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किसानों का प्रेरक गीत जो खेती आरम्भ करते समय गाया जाता है
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कुचामनी ख्याल शैली के प्रवर्तक थे
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ख्याल शैली के जयपुर घराने के प्रवर्तक माने जाते हैं
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घड़ावण और वलावण संबंधित हैं
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जैसलमेर जिले में पति के परदेस जाने पर उसके वियोग में गाए जाने वाले गीत कहलाते हैं
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झालर, घड़ा, घुँघरू, लेजिम, घुरालियौ और रमझोल वाद्य हैं
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तम्बूरा, वेणों और चौतारा नाम से जाना जाता है
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धातु निर्मित घन वाद्य है
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नाहटा की गुवाड़, वारह गुवाड़, दर्जियों की गुवाड़ स्थित है
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निहालदे की कथा सुनाने वाले जोगी बजाते हैं
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पाबूजी के पवाड़ों के गायन में प्रयुक्त लोक वाद्य है
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पीतल व काँसे की मिश्रित धातु का गोलाकार वाद्य जिसको हमेशा जोड़े में बजाया जाता है
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पीतल से बना सुषिर वाद्य जिसको रणभेरी भी कहते हैं
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प्रतापगढ़ रियासत से सम्बन्ध रहा है
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प्रसिद्ध संगीतकार पंडित भीमसेन जोशी सम्बन्धित हैं
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प्रसिद्ध संगीतज्ञ घम्घे खुदाबख्श खां संबंधित हैं
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प्रसिद्ध संगीतज्ञ हदू खां व हस्सू खां संबंधित हैं
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फसल बोने के गीत को कहते हैं
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बीछूड़ो लोकगीत का प्रचलन है
उत्तर
मेवाड़-हाड़ौती क्षेत्र में
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भगवान शिव का वाद्य माना जाता है